Sunday, May 29, 2011

ज़रा गलत फ़हमी हो गयी ....

खुशियों में डूबा शहर था ,

गम की धूप निकल आई

तकलीफ हुई शुरुआत में थोड़ी ,

फिर ये धूप ही तो बादल लाई |

मतलब नहीं मुझे ख़ुशी से

कोई नाता दुःख से रखना है ,

गलियों को तो इंतज़ार है बस बारिस का

मेरा जहाज जो चलाना है |

एक दिन मौसम साफ़ था

गलियों में धूप का कहर था

शाम को दिल में आराम था

क्यूंकि आसमाँ थोडा श्याम था

इंतज़ार था उनके बरसने का

ज़रा गलत फ़हमी हो गयी

मिलने मुझसे वो हवा गयी

वो मेरी गलियां सुखी रह गयी


पर ये सुना था कहीं , खोना होंसला कभी

हुई बारिस तो क्या , भरी वो गलिया तो क्या

जो क्या हुआ जहाज को चला सका ,

हम तो इसे उड़ाकर काम चला लेंगे | |

14 comments:

  1. मिलने मुझसे वो हवा आ गयी

    वो मेरी गलियां सुखी रह गयी …


    huhaaaaaaaa

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  2. भाव काफी अच्छा है ,
    "जो क्या हुआ जहाज को चला न सका ,
    हम तो इसे उड़ाकर काम चला लेंगे |"
    इन पंक्तियों में काफी गहराई है
    बाकी कहीं कहीं पर ऐसा लगा की बेहतर शब्दों का चयन किया जा सकता था ,
    पर कविता दिल से लिखी गयी जान पड़ती है ,
    जो पाठक के ह्रदय को छूती है |

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  3. धन्यवाद पियूष और रवि

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  4. saga of life xplained metaphorically ..... especially liked the end:
    पर ये सुना था कहीं , न खोना होंसला कभी

    न हुई बारिस तो क्या , न भरी वो गलिया तो क्या

    जो क्या हुआ जहाज को चला न सका ,

    हम तो इसे उड़ाकर काम चला लेंगे | |

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  5. बहुत ही सुन्दर लिखा है !

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  6. achha laga aapka dil ka bhaav jaanke jitu ji...mohabbat ka jahaaj tairaate tairaate khud hi doob jaoge...isse achha hai jahaaj uda lo ; khud udoge bhi aur uthoge bhi :)

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  7. thanx abhas..and deepak...har jahaj mohabbat ka nahi hota hai be...mohabbat se upar uthke sochega kabhi

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  8. macha rhe ho jitu da kuchh feeling ha :)

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  9. "JAHAAZz" ka jo istemaal aapne badlte mausam me prastut kiya hai, masha-allah wo kaabile tareef hai..- :) Bimzzy

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