दिलों का बाज़ार लगा था
नीलामी की अर्जी हमने भी लगा दी
हजारो लाखो की भीड़ में ,
दुकान हमने भी सजा डाली
सुबह के बैठे थे , शाम हो आई
पर कोई खरीददार नहीं मिला
कम कुछ हम भी कहाँ
एक बार फिर बोली लगा डाली
कमबख्त रात हो आई .
अब कुछ किरायेदार बचे थे
वो भी किराया कम दे रहे थे
दिल का हमारे मोल भाव कर रहे थे
दोष न जाने इस दिल का था
या कमी हमारी दूकान में थी
पर क्या करे दिल तो बेचना ही था
प्यार की कुछ किश्ते जो चुकानी थी
पर ये दिल न बिका
न जाने इसे कोई क्यूँ न मिला
ये टूटा दिल खुद से बोला
घबराता क्यूँ है मुसाफिर
अगले साल फिर चले आना
ये बाज़ार तो हर साल लगता है ..
