जैसे दूर तक फैला सागर डूब गया हु जैसे उसमे
तैरा तो पर कब तक तैरुं
दिखे कहीं किनारा तो
ऐसा विशाल मरुस्थल फैला
चला मै राही राह बटोहता
चलते चलते गया वो सूरज
फिर बिन किरणों के वो निकला
कैसी अद्भुत चीज़ ये पृथ्वी
बन गयी है भूल भुलैया
मिले न कोई दिखे न कोई
जैसे रख के भूल गया है कोई..
