खुशियों में डूबा शहर था ,
गम की धूप निकल आई
तकलीफ हुई शुरुआत में थोड़ी ,
फिर ये धूप ही तो बादल लाई |
मतलब नहीं मुझे ख़ुशी से
न कोई नाता दुःख से रखना है ,
गलियों को तो इंतज़ार है बस बारिस का
मेरा जहाज जो चलाना है |
एक दिन मौसम साफ़ था
गलियों में धूप का कहर था
शाम को दिल में आराम था
क्यूंकि आसमाँ थोडा श्याम था
इंतज़ार था उनके बरसने का
ज़रा गलत फ़हमी हो गयी
मिलने मुझसे वो हवा आ गयी
वो मेरी गलियां सुखी रह गयी …
पर ये सुना था कहीं , न खोना होंसला कभी
न हुई बारिस तो क्या , न भरी वो गलिया तो क्या
जो क्या हुआ जहाज को चला न सका ,
हम तो इसे उड़ाकर काम चला लेंगे | |
