Sunday, June 24, 2012

दिल न बिका ...


दिलों  का  बाज़ार  लगा  था 
नीलामी  की  अर्जी  हमने  भी  लगा  दी 
हजारो  लाखो  की  भीड़  में ,
 दुकान  हमने  भी  सजा  डाली 

सुबह  के  बैठे  थे , शाम  हो  आई 
पर  कोई  खरीददार  नहीं  मिला 
कम  कुछ  हम  भी  कहाँ 
एक  बार  फिर  बोली  लगा  डाली 

कमबख्त  रात  हो  आई  .
अब  कुछ  किरायेदार  बचे  थे 
वो  भी  किराया  कम  दे  रहे  थे 
दिल  का  हमारे  मोल  भाव  कर  रहे  थे 

दोष  न  जाने  इस  दिल  का  था 
या  कमी  हमारी  दूकान  में  थी 
पर  क्या  करे  दिल  तो  बेचना  ही  था 
प्यार  की  कुछ  किश्ते  जो  चुकानी  थी 

पर   ये  दिल  न  बिका 
न  जाने  इसे  कोई  क्यूँ  न  मिला 

ये टूटा  दिल  खुद   से  बोला  
घबराता  क्यूँ  है  मुसाफिर 
अगले  साल  फिर  चले  आना 
ये  बाज़ार  तो  हर  साल  लगता  है  ..